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time:2021-10-24 04:31:14 सिप में क्यों करना चाहिए लंबे समय तक निवेश Views:4591

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न्यूनतम निवेश की सीमा का कम होना, इंवेस्टमेंट में अनुशासन, रुपए की औसत लागत, कम्पाउडिंग की ताकत सिप में निवेश के प्रमुख फायदों में शामिल हैं.
जुजेर गबाजीवाला, निदेश, वेंचुरा सिक्योरिटीज


अधिकतर निवेशक इक्विटी फंड्स में निवेश करने के लिए सिस्टेमैटिक इंवेस्टमेंट प्लान (सिप) को तरजीह देते हैं. हाल के समय में सिप को बहुत अधिक लोकप्रियता मिली है. इसकी वजह है कि इसके कई तरह के आम फायदों के बारे में लोग अवगत हो गए हैं.

न्यूनतम निवेश की सीमा का कम होना, इंवेस्टमेंट में अनुशासन, रुपए की औसत लागत, कम्पाउडिंग की ताकत सिप में निवेश के प्रमुख फायदों में शामिल हैं. साथ ही ज्यादा फायदा हासिल करने के लिए या घाटा कम करने के लिए मार्केट को टाइम करने की जरूरत नहीं होती है. मार्च, 2021 में सिप कलेक्शन 9,182 करोड़़ रुपये पर रहा.

यह सालाना आधार पर 6.3 फीसद की वृद्धि को दिखाता है. यह आंकड़ा इस बात को दिखाता है कि अधिक-से-अधिक निवेशक निवेश के लिए सिप का रुख कर रहे हैं. निवेशक जितने लंबे समय तक निवेश करेंगे, उन्हें उतना अधिक फायदा होगा. सिप में निवेश करने वाले निवेशकों को नीचे उल्लेखित बिंदुओं को भी ध्यान में रखना चाहिए.

होल्डिंग की औसत अवधि

अगर कोई निवेशक 20 साल तक निवेश करता है तो हर सिप के लिए होल्डिंग की औसत अवधि 10 साल होगी. इसकी वजह यह कि केवल आपकी सिप की पहली किस्त के भुगतान को 20 साल पूरे हुए हैं. वहीं, सिप की आपकी हालिया किस्त को एक महीने भी नहीं पूरा हुआ है.

ऐसे में अगर कोई व्यक्ति 20 साल से निवेश कर रहा है तो भी होल्डिंग की औसत अवधि केवल 10 साल होगी. ऐसे में निवेशक को होल्डिंग की औसत अवधि को ध्यान में रखना चाहिए. इंवेस्टमेंट की शुरुआत से होल्डिंग की अवधि की गणना नहीं करनी चाहिए.

कम्पाउंडिंग की ताकत

सिप के जरिए निवेश करने का एक फायदा यह है कि आप कम्पाउंडिंग की ताकत का लाभ उठा पाते हैं. लंबे समय तक निवेश किस प्रकार फायदेमंद होता है, इसे समझने के लिए आइए देखते हैं कि अलग-अलग अवधि के लिए हर महीने 10 हजार रुपये के निवेश पर कितना रिटर्न हासिल होता है.

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हालांकि, निवेशक s के जरिए निवेश करना जारी रखते हैं लेकिन चिंता की बड़ी वजह यह है कि कई निवेशक समय से पहले अपनी s बंद करा देते हैं. समय से पहले निवेश बंद करने वालों में से कई समयावधि पूरी होने से पहले फंड निकाल लेते हैं.

ऐसा सामान्य तौर पर देखा जाता है कि लोग 7-10 साल तक निवेश के लक्ष्य के साथ में निवेश शुरू करते हैं लेकिन तीन-चार साल बाद बीच में ही उसे बंद करा देते हैं. निवेशकों के s में निवेश जारी नहीं रखने की कई वजहें हो सकती हैं. कुछ कारणों पर नीचे चर्चा की गई हैः

शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव
आम तौर पर निवेशकों को बताया जाता है कि वे 10-15 साल बाद करीब 12-15 फीसद सालाना की दर से रिटर्न की उम्मीद कर सकते हैं. हालांकि, ये रिटर्न एक समान नहीं होते हैं (इसका मतलब है कि हम हर साल सकारात्मक रिटर्न की उम्मीद नहीं कर सकते हैं, जबकि फिक्स्ड डिपोजिट में हम ऐसा करते हैं.). इसकी वजह यहा है कि इक्विटी फंड्स में पर बाजार के उतार-चढ़ाव का असर पड़ता है.

इस तरह बाजार के ऊपर या नीचे होने से निवेशकों के फायदे में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है. इक्विटी फंड्स में निवेश से प्राप्त होने वाला रिटर्न कभी भी एकसमान नहीं होता है. अगर हम पिछले 20 कैलेंडर वर्ष में निफ्टी 50 के रिटर्न को देखें तो यह पता चलता है कि किसी निवेशक को सबसे ज्यादा 78 फीसद (2009) का रिटर्न हासिल हुआ था.

वहीं, -51.8 % (2008) का न्यूनतम रिटर्न प्राप्त हुआ था. इसी तरह बाजार के ऊपर या नीचे होने से रिटर्न पर भी असर देखने को मिलता है. किसी भी निवेशक के लिए इन रिटर्न्स की तुलना फिक्स्ड इनकम वाले फंड से करना सही नहीं होगा.

पा रदर्शिता और रिडेम्शन की आसान प्रक्रिया
म्यूचुअल फंड्स में इस बात को लेकर पारदर्शिता होती है कि किसी निवेशक का पैसा कहां निवेश हो रहा है. फंड्स का NAV दैनिक आधार पर उपलब्ध होता है और फंड्स का पोर्टफोलियो मासिक आधार पर अवेलेबल होता है. यह काफी लाभदायक होता है क्योंकि निवेशकों को इस बात की जानकारी होती है कि उनके रुपये का निवेश कहां हो रहा है.

दूसरी ओर, कई बार इस चीज की वजह से नुकसान भी उठाना पड़ता है क्योंकि कभी-कभी किसी खास कंपनी के बारे में नकारात्मक खबर से निवेशकों में घबराहट पैदा हो जाती है. कई बार तो लोग घबराहट में आकर बिकवाली में लग जाते हैं. बहुत संभव है कि NPS व ULIPS जैसे इंवेस्टमेंट के अन्य इंस्ट्रुमेंट्स में इन सिक्योरिटीज को होल्ड कर लिया जाए लेकिन इससे जुड़ी जानकारी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं होती है.

म्यूचुअल फंड में आसानी से रिडमेप्शन (भुनाने) की सुविधा भी कई बार ड्रॉबैक (खामी) बन जाती है. चूंकि निवेशक आसानी से अपने निवेश को रिडीम कर सकते हैं इसलिए वे उम्मीद से थोड़ा भी कम रिटर्न देखते ही रिडेम्पशन का विकल्प तलाशने लगते हैं.

रिटर्न्स को लेकर अंसतोष
कई निवेशक अपनी s के रिटर्न से संतुष्ट नहीं होते हैं और सिस्टेमैटिक इंवेस्टमेंट प्लान में निवेश बंद करने का निर्णय करते हैं. निवेशक शुरू करने के एक से दो साल के भीतर उस अवधि में प्राप्त होने वाले रिटर्न का मूल्यांकन करने लगते हैं. इस बिन्दु पर कई निवेशकों को लगता है कि उन्होंने निवेश को लेकर गलत फैसला किया है.

हालांकि, वह इस बात को नहीं समझते हैं कि दो साल की में होल्डिंग की औसत अवधि महज एक साल है. वे अपने निवेश के रिटर्न की तुलना अन्य स्टॉक या यहां तक कि निफ्टी या सेंसेक्स से करने लगते हैं. यह पूरी तरह से सेब और नारंगी के बीच तुलना करने जैसा है लेकिन तात्कालिक अनुभव सही नहीं होने के कारण अधिकतर कुछ और नहीं सुनना चाहते हैं.

कुछ निवेशक यह सोचकर म्यूचुअल फंड्स से कतराने लगते हैं कि उन्हें इन फंड्स में निवेश से बढ़िया रिटर्न नहीं मिलेगा. वहीं, कुछ निवेशक जल्दबाजी में निवेश जारी नहीं रखने का फैसला कर जाते हैं. अगर कोई निवेशक कम समय में निवेश जारी नहीं रखने का फैसला करता है तो वह बाद के वर्षों में होने वाले लाभ से वंचित रह जाता है.

हमारे आंतरिक रिसर्च के मुताबिक इक्विटी फंड्स (ग्रोथ ऑप्शन) में 20 साल पहले (जुलाई, 1999 से पहले) हर माह 10,000 का शुरू करने पर सभी फंड्स का औसत वैल्यू कुछ इस प्रकार होताः


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हम ऊपर दी गई सारणी में देख सकते हैं कि अगर एक निवेशक 20 साल तक निवेश करता है तो सबसे अच्छे केस में निवेश में उसे 12.2 गुना और सबसे कमजोर रिटर्न वाले केस में 3.3 गुना रिटर्न हासिल होता है.

उतार-चढ़ाव और निगेटिव रिटर्न की प्रत्याशा (प्रोबेबलिटी)
यह आम तौर पर देखा गया है कि की अवधि बढ़ने पर निगेटिव रिटर्न और उतार-चढ़ाव की प्रत्याशा कम हो जाती है. इस चीज को बेहतर तरीके से समझने के लिए हमने कोटक फ्लैक्सीकैप फंड के उदाहरण पर गौर किया. यह फ्लैक्सी कैप फंड है और 10 साल से ज्यादा समय से मौजूद है. 21 फरवरी की तारीख तक इंडेक्स फंड्स को छोड़कर सभी ओपन-एंडेड इक्विटी फंड्स में इसका एयूएम सबसे ज्यादा है.


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लाल रंग से चिह्नित सेल कोविड-19 महामारी के असर को दिखाते हैं, जो बहुत ही दुर्लभ और असाधारण मामला है.

ऊपर दी गई सारणी में हम यह देख सकते हैं कि निवेश की अवधि एक साल होने पर निगेटिव रिटर्न की संभावना बढ़ जाती है. जबकि अवधि के दो साल होते ही निगेटिव रिटर्न की गुंजाइश कम हो जाती है.

वहीं, अगर निवेश की अवधि तीन वर्ष या उससे ज्यादा रहती है तो वर्ष 2017-18 को छोड़कर निगेटिव रिटर्न देखने को नहीं मिलता है. एसआईपी की अवधि पांच साल से ज्यादा होते ही रिटर्न में सुधार देखने को मिलता है.

सिप में सफल निवेश का राज
आप यह समझ गए होंगे कि के जरिए निवेश करने पर आपको मार्केट को टाइम नहीं करना पड़ता है. लेकिन निवेशकों को एसआईपी को इतने लंबे वक्त के लिए अपनाना चाहिए ताकि आपके रिटर्न पर बाजार में तेजी या गिरावट का असर ना पड़े. वारेन बफे ने 11 साल की आयु में निवेश करना शुरू कर दिया था लेकिन 56 साल की आयु के होने के बाद ही वह अरबपति बने.




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(Disclaimer: The opinions expressed in this column are that of the writer. The facts and opinions expressed here do not reflect the views of www.economictimes.com.)

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सामान्‍य सिप के मामले में निवेशक सिप की अवधि में अपना कॉन्ट्रिब्‍यूशन नहीं बढ़ा सकते हैं. अगर वे इसे बढ़ाना चाहते हैं तो उन्‍हें नए सिरे से सिप शुरू करना होगा या एकमुश्त निवेश करने की जरूरत होगी.विशेषज्ञों का कहना है कि औद्योगिक कमोडिटीज में निवेश से सोने के मुकाबले बढ़िया रिटर्न मिल सकता हैम्‍यूचुअल फंडों के एक्सपेंस रेशियो के बारे में यहां जानिए सब कुछ

निवेशकों के सोने का आकर्षण बढ़ा है. वित्त वर्ष 2020-21 में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ईटीएफ) में निवेशकों ने 6,900 करोड़ रुपये डाले.भारतीय नियामकों का ऐसी करेंसी को लेकर रुख स्पष्ट नहीं है. उन्‍होंने साफ-साफ कुछ भी नहीं कहा है कि भारतीय इनमें ट्रेड करें या नहीं.क्‍या आपको फंड ऑफ फंड्स में निवेश करना चाहिए?

यूनिट लिंक्ड इंश्‍योरेंस प्‍लान यानी यूलिप और म्यूचुअल फंड कई मायनों में अलग होते हैं. यह और बात है कि कई लोग इन्‍हें एक जैसा प्रोडक्ट समझने की भूल कर बैठते हैं. आपको भी अगर ऐसी गलतफहमी है तो यहां हम इन दोनों के बीच कुछ महत्वपूर्ण अंतरों के बारे में बता रहे हैं.एक साल पहले इस फंड के अनुभवी मैनेजर ने इस्तीफा दिया. हालांकि, स्‍कीम की बागडोर मजबूत प्रबंधन के हाथों में है. निवेश के तरीके में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है.लंबी अवधि में जमा के लिए पोस्ट ऑफिस का रुख कर रहे हैं निवेशक

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